सुने री मैंने निरबल के बल रामा।
पिछली साख भरूँ सन्तन की, अड़े साँवरे काम।।
जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरो नहिं काम।
निरबल है बलराम पुकार्यो, आये आधे नाम।।
द्रुपद सुता निरबल भई ता दिन, तजि आये निज धाम।
दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन रूप भये श्याम।।
अपबल तपबल और बाहुबल, चौथो है बल दाम।
सूर किशोर कृपा ते सब बल, हारे को हरिनाम।।
– श्री सूरदास, सूरसागर